a) मातृ-पितृ पूजन दिवस :
सैकड़ों वर्षों के विदेशी आक्रमणों के बावजूद हमारी सनातन संस्कृति आज भी विश्व के लिए नैतिक मूल्यों की पथप्रदर्शक बनी हुई है । परंतु इसके विपरीत पाश्चात्य चकाचौंध से प्रभावित आज के युवक-युवतियां वैलेंटाइन डे जैसे दिवसों के माध्यम से अनैतिक संबंधों के शिकार हो रहे है । उसीसे भ्रूणहत्या जैसी कुरीतियाँ, आत्महत्याएँ और नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार बढ़ रहा है ।
14 फरवरी को वैलेंटाइन डे मनाकर युवक-युवतियाँ तबाही के रास्ते न जायें बल्कि वे अपना जीवन उन्नत करके ओजस्वी-तेजस्वी बनें और उनके ह्रदय में माता-पिता व गुरुओं के प्रति आदर, सम्मान बढ़ता रहे इसी उद्देश्य से पूज्य बापूजी की पावन प्रेरणा से समितियों द्वारा पिछले कई वर्षों से वैश्विक स्तर पर 14 फरवरी को “मातृ-पितृ पूजन दिवस” मनाया जा रहा है ।
समिति द्वारा विद्यालयों-महाविद्यालयों, सोसाइटीयों तथा गाँव-गाँव, शहर-शहर में पुरे फरवरी महीने तक इन कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है । गत वर्ष देश-विदेश के करोड़ों परिवारों में यह पर्व मनाया गया ।
भारत के पूर्व राष्ट्रपति, केन्द्रीय मंत्री, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल, सांसद, विधायक तथा सभी धर्मों के संत-समाज, फिल्मी जगत की हस्तियाँ एवं अन्य अनेक गणमान्य लोगों ने समिति द्वारा आयोजित हो रहे इन कार्यक्रमों को सराहा गया है ।
b) तुलसी पूजन दिवस :
तुलसी का धार्मिक, आयुर्वेदिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक महत्त्व है । साथ ही यह स्वास्थ्य व पर्यावरण-सुरक्षा की दृष्टि से भी अहम है । जिस घर में तुलसी का वास होता है वहाँ आध्यात्मिक उऩ्नति के साथ सुख-शांति एवं आर्थिक समृद्धि स्वतः होती है । वातावरण में स्वच्छता एवं शुद्धता, प्रदूषण-शमन, घर परिवार में आरोग्य की जड़ें मजबूत करना आदि तुलसी के अनेक लाभ हैं ।
प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी महिमामयी तुलसी का सम्पूर्ण लाभ मिले और देश में सुख-सौहार्द, स्वास्थ्य व शांति की वृद्धि होकर जन-समाज का जीवन मंगलमय हो, इस लोकहितकारी उद्देश्य से संत श्री आशारामजी बापू की प्रेरणा से वर्ष 2014 से 25 दिसम्बर के दिन ‘तुलसी पूजन दिवस’ मनाने का शुभारम्भ हुआ । तब से श्री योग वेदांत सेवा समितियों द्वारा बड़े स्तर पर देश-विदेश में प्रतिवर्ष यह दिवस विद्यालयों, महाविद्यालयों, मंदिरों, सोसायटियों, बाल संस्कार केन्द्रों तथा धार्मिक स्थलों में सामूहिक रूप से मनाया जाता है ।’’
पाश्चात्य कल्चर का प्रचार-प्रसार करने वाले पंथ 25 दिसम्बर के निमित्त कई कार्यक्रम करते हैं एवं हमारे बाल, युवा एवं प्रौढ़ – सभी को भोगवाद व हलके संस्कारों की ओर प्रेरित कर महान भारतीय संस्कृति से दूर ले जाते हैं ।
इन दिनों में बीते वर्ष की विदाई पर पाश्चात्य अंधानुकरण से नशाखोरी, आत्महत्या आदि की वृद्धि होती जा रही है । तुलसी उत्तम अवसादरोधक एवं उत्साह, स्फूर्ति, सात्त्विकता वर्धक होने से इन दिनों में यह पर्व मनाना वरदानतुल्य साबित हो रहा है ।
श्री योग वेदांत सेवा समितियों ‘तुलसी पूजन कार्यक्रम’ का बड़े पैमाने पर आयोजन किया जाता है जिससे समाज के लोग अपनी संस्कृति के गौरव को समझें और लाभ उठायें ।
प्रकृति-संरक्षण, संस्कृति-संवर्धन और आध्यात्मिक जागरण का पर्व है । यह केवल एक पर्व नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति के सुसंस्कारों से विमुख जन-जन को उनसे पुनः जोड़नेवाला एक अभियान है ।
पाश्चात्य चकाचौंध से प्रभावित होकर आधुनिकता के नाम पर समाज धीरे-धीरे अपने नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों और धार्मिक संस्कारों से दूर होता जा रहा है । विश्व-मानव को पतन की खाई में गिरने से बचाकर उन्नति के शिखर तक पहुँचाने के लिए ब्रह्मज्ञानी संत पूज्य बापूजी द्वारा शुरू किया गया यह पर्व देश-विदेश की समितियों द्वारा हर वर्ष 25 दिसम्बर को विद्यालयों-महाविद्यालयों, सोसाइटीयों में मनाया जाता है । आज यह पर्व विश्वव्यापी हो गया है ।
c) रक्षाबंधन पर्व :
भारतीय संस्कृति में रक्षाबंधन आत्मीयता और स्नेह के बंधन से पवित्र रिश्तों, पवित्र भावों को मजबूती प्रदान करने का पर्व है । यह पर्व मात्र रक्षासूत्र के रूप में राखी बांधकर रक्षा का वचन नहीं देता वरन् संयम, स्नेह, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के द्वारा हृदयों को बाँधने का भी अवसर देता है ।
इस पर्व पर समितियों द्वारा महिला उत्थान मंडल के सहयोग से देश की रक्षा में समर्पित सुरक्षा प्रहरियों जैसे बीएसएफ, सीआरपीएफ, आर्मी के जवानों को तथा इसके साथ ही केन्द्रीय मंत्री, सांसद, विधायक, पुलिस अधिकारी, जिलाधिकारी आदि गणमान्य व्यक्तियों को वैदिक रक्षासूत्र बांधकर उनकी सुरक्षा की मंगल कामना की जाती है ।
d) गौ – सेवा :
गाय माता ने मानव समाज को स्वास्थ्य-समृद्धि का अमूल्य खजाना प्रदान किया है । गाय माता केवल स्वास्थ्य ही नहीं पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है ।
केवल गाय ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसे भारत में माता का उच्च स्थान दिया गया है । मगर आज दुर्भाग्य का विषय है कि समाज के लोग गाय द्वारा प्रदत्त अमूल्य स्वास्थ्य-समृद्धि के खजाने को भूलते जा रहे हैं । फलस्वरूप भारत में अनेकों कत्लखाने खुल गये हैं ।
समाज को अमूल्य सुख-समृद्धि और आरोग्यता प्रदान करनेवाली गौमाता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने तथा भारतियों की आस्था व श्रद्धा का केन्द्र होने के नाते, दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे कत्लखानों पर रोक लगाने के लिए ‘श्री योग वेदांत सेवा समिति’ द्वारा गोपाष्टमी का उत्सव ‘गौ-रक्षा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है |
1) समितियों द्वारा गौ संरक्षण-संवर्धन हेतु गोपाष्टमी के दिन गौ-रक्षा यात्रा का आयोजन किया जाता है तथा अखबारों, पत्रिकाओं आदि के माध्यम से जन-जागृति का कार्य किया जाता है ।
2) देश में अधिकाधिक संख्या में खुल रहे कत्लखानों पर रोक लगे और गौ-सुरक्षा के लिए पूरे भारत में कडक कानून बनाये जायें व उनका असरकारक अमलीकरण हो, गौ-मांस निर्यात पर प्रतिबंध लगे आदि मांगों को लेकर समिति द्वारा क्षेत्र के जिलाधिकारी को ज्ञापन दिया जाता है ।
3) समितियों द्वारा जो गौ माता सड़कों पर उपेक्षित है, उनके लिए समय-समय पर हरा चारा, भूसा, सब्जियाँ, गुड़ एवं पानी आदि की व्यवस्था की जाती है एवं लोगों को भी गौ-पालन के लिए प्रेरित किया जाता है ।
समितियों द्वारा गौ-वध के दुष्कृत्य को देश में पूर्णरूप से बंद करके-करवाके मानवता, भारतीय संस्कृति और भारतीयों की आस्था की रक्षा करने हेतु व्यापक रूप से प्रयास किये जाते है ।
e) गीता जयंती :
पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होकर अशांति की खाई में गिरते समाज को गीता का ज्ञान ही सही दिशा दिखाकर सर्वांगीण उन्नति के शिखरों तक सहजता से पहुँचा सकता है । गीता का धर्म, भक्ति और ज्ञान ऐसा है कि वह प्रत्येक समस्या का समाधान करता है । यह गीता ग्रंथ पुरे विश्व में अद्वितीय है ।
पूज्य बापूजी कहते हैं कि “आज के चिंताग्रस्त, अशांत मानव को गीता के ज्ञान की अत्यंत आवश्यकता है । अतः मानवता का कल्याण चाहनेवाले पवित्रात्माओं को गीता-ज्ञान घर-घर तक पहुँचाने में लगना चाहिए ।”
समितियों द्वारा श्रीमद भगवदगीता जयंती व्यापक रूप से मनायी जाती है । गीता के महत्त्व एवं ज्ञान का प्रचार-प्रसार हेतु संकीर्तन यात्राओं का आयोजन कर गीता-ज्ञान पर आधारित सत्साहित्य, पाम्पलेट आदि का वितरण किया जाता है ।
समितियों द्वारा गीता ग्रंथों का वितरण, विद्यालयों व बाल संस्कार केन्द्रों में गीता श्लोक वाचन, गीता ज्ञान-प्रतियोगिता, साप्ताहिक सत्संग केन्द्रों में भगवदगीता के सामूहिक पाठ का आयोजन आदि के माध्यम से जनमानस तक गीता के ज्ञान एवं उसकी महिमा को पहुँचाया जाता है ।
f) राष्ट्र जागृति कीर्तन यात्रा :
वातावरण में सात्त्विकता, पवित्रता लाने तथा वैचारिक प्रदुषण दूर करने हेतु भारत भर में समितियाँ राष्ट्र जागृति हरिनाम संकीर्तन यात्राओं व प्रभातफेरियों का आयोजन करती है, जिनके दौरान सत्साहित्य वितरण भी किया जाता है । सनातन संस्कृति के प्रचार का एक दिव्या प्रयास है जो मन को शांति देता है, समाज को जोड़ता है और जीवन को दिशा प्रदान करता है ।
समितियों द्वारा पूज्य बापूजी के अवतरण दिवस, गुरुपूर्णिमा, गीता जयंती, तुलसी पूजन दिवस आदि पर्वों पर विशाल राष्ट्र जागृति कीर्तन यात्राओं का आयोजन किया जाता है । जिसमें पर्यावरण सुरक्षा, माता-पिता की सेवा, गौ सेवा, व्यसनमुक्ति, गुरुकुल शिक्षा पद्धति आदि को दर्शाती हुई सांस्कृतिक झाँकियाँ सजाई जाती है । इन झाँकियों के माध्यम से समाज को सनातन संस्कृति, नैतिक मूल्यों और पर्यावरण सुरक्षा का संदेश देकर जागरूकता फैलाने का प्रयास किया जाता है ।
इसके अलावा समितियों द्वारा साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम; गर्मियों में शरबत/छाछ वितरण एवं जल प्याऊ सेवा; विश्वशांति, सदभाव एवं मानव कल्याण हेतु हवन-यज्ञ आदि विभिन्न सेवाओं का आयोजन किया जाता है ।